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ध्वनि प्रदूषण
शोर एक अनचाही ध्वनि है। जो ध्वनि कुछ को अच्छी लगती है वही दूसरों को नापसन्द
हो सकती है। यह विभिन्न घटकों पर आधारित होती है। प्राकृतिक वातावरण हवा,
ज्वालामुखी, समुद्री जानवरों, पक्षियों की स्वीकार युक्त आवाजों से भरा होता है।
मनुष्य द्वारा निर्मित ध्वनियों में मषीन, कारें, रेलगाड़ियाँ, हवाई जहाज, पटाखे,
विस्फोटक आदि शामिल हैं। जो कि ज्यादा विवादित हैं। दोनों तरह के ध्वनि प्रदूषण,
नींद, सुनना, संवाद यहाँ तक शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करते
हैं।
यह सिद्ध हो गया है कि ध्वनि प्रदूषण, वायु प्रदूषण का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
जिसे पहले वस्तुगत प्रदूषण का हिस्सा माना जाता था। ध्वनि प्रदूषण अब औद्योगिक
पर्यावरण का अनिवार्य अंग है जो कि औद्योगिक शहरीकरण के बढ़ने के साथ बढ़ता ही जा रहा
है। यहाँ तक गैर औद्योगिक क्षेत्रों में भी छपाई रंगाई की मशीन, कारों की मरम्मत,
ग्राइडिंग आदि कार्यों में आस-पास के वातावरण में शोर पैदा होता रहता है। यह शोर न
केवल चिड़चिड़ाहट, गुस्सा पैदा करता है बल्कि ध्वनियों में रक्त प्रवाह को प्रवाहित
कर हृदय संचालन की गति को तीव्र कर देता है। लगातार का शोर खून में कोल स्ट्रोल की
मात्रा बढ़ा देता है जो कि रक्त नलियों को सिकोड़ देता है जिससे हृदय रोगों की
सम्भावनायें बढ़ती हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ता शोर स्नायविक
बीमारी, नर्वसब्रेक डाउन आदि को जन्म देता है।
शोर, हवा के माध्यम में संचरण करता है। ध्वनि की तीव्रता को नापने की निर्धारित
इकाई को डेसीबल कहते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि 100 डेसीबल से अधिक की ध्वनि
हमारी श्रवण शक्ति को प्रभावित करती है। मनुष्य को यूरोटिक बनाती है। विश्व
स्वास्थ्य संगठन ने 45 डेसीबल की ध्वनि को, शहरों के लिए आदर्श माना है। बड़े शहरों
में ध्वनि का माप 90 डेसीबल से अधिक हो जाता है। मुम्बई संसार का तीसरा, सबसे अधिक
शोर वाला नगर है। दिल्ली ठीक उसके पीछे है।
पानी का प्रदूषण और बर्बादी
जब जहरीले पदार्थ, झीलों, झरनों, नदियों, सागरों तथा अन्य जलाशयों में जाते हैं
तो या तो घुल जाते हैं या तैरते रहते हैं या नीचे तलहटी में बैठ जाते हैं। इससे
पानी प्रदूषित हो जाता है, उसकी गुणता घट जाती है, जलीय पर्यावरण को प्रभावित करती
है। प्रदूषक नीचे भूतल में जाकर भी जल को प्रदूषित कर देते हैं।
आज काफी लोग अपने घर का कूड़ा-कचरा नदियों, नहरों, झीलों, तालाबों, समुद्र में
डाल देते हैं। जिससे यह जलसंग्रह डिब्बों, बोतलों तथा अन्य हानिकारक रसायन युक्त
सामग्री से भर जाते हैं। अतीत में मानव, पशुओं और वनस्पति तत्वों से बना साबुन सभी
तरह की धुलाई के लिए प्रयोग करते थे पर आज के अधिकतर सफाई उत्पाद अप्राकृतिक
डिटर्जेन्ट से बनते हैं जो कि पैट्रोरसायनिक उद्योगों से आते हैं। इनमें फास्फेट
होता है जो कि पानी को हल्का बनाने के लिए प्रयोग होता है। यह तथा अन्य रसायन पानी
में रहने वाले सभी प्रकार के जीवन को प्रभावित करते हैं।
पानी प्रदूषण का इतना भयंकर प्रभाव केवल मनुष्य वरन् पशुओं-मछलियों-चिड़ियों सब
पर पड़ता है। प्रदूषित जल न पीने के योग्य, न आनन्द के लिए, न कृषि के लिए और न
उद्योगों के अनुकूल होता है। यह तालाबों, झीलों, नहरों के सौन्दर्य को भी कम कर
देता है। सबसे गम्भीर तथ्य है कि प्रदूषित जल, जलीय जीवन को नष्ट कर देता है, उसकी
उत्पादन क्षमता को भी कम कर देता है। अंतत: यह मनुष्य के जीवन के लिए अत्यन्त घातक
है। कोई भी प्रदूषित पानी के प्रभाव से नहीं बच सकता।
वायु प्रदूषण
प्रदूषण की एक परिभाषा यह भी हो सकती है कि ''पर्यावरण प्रदूषण उस स्थिति को
कहते हैं जब मानव द्वारा पर्यावरण में अवांछित तत्वों एवं ऊर्जा का उस सीमा तक
संग्रहण हो जो कि पारिस्थितिकी तंत्र द्वारा आत्मसात न किये जा सकें।'' वायु में
हानिकारक पदार्थों को छोड़ने से वायु प्रदूषित हो जाती है। यह स्वास्थ्य समस्या पैदा
करती है तथा पर्यावरण एवं सम्पत्ति को नुकसान पहुँचाती है। इससे ओजोन पर्त में
बदलाव आया है जिससे मौसम में परिवर्तन हो गया है।
आधुनिकता तथा विकास ने, बीते वर्षों में वायु को प्रदूषित कर दिया है। उद्योग,
वाहन, प्रदूषण में वृद्धि, शहरीकरण कुछ प्रमुख घटक हैं। जिनसे वायु प्रदूषण बढ़ता
है। ताप विद्युत गृह, सीमेंट, लोहे के उद्योग, तेल शोधक उद्योग, खान,
पैट्रोरासायनिक उद्योग, वायु प्रदूषण के प्रमुख कारण हैं।
वायु प्रदूषण के कुछ ऐसे प्रकृति जन्य कारण भी हैं जो मनुष्य के वष में नहीं है।
मरूस्थलों में उठने वाले रेतीले तूफान, जंगलों में लग जाने वाली आग एवं घास के जलने
से उत्पन्न धुऑं कुछ ऐसे रसायनों को जन्म देता है, जिससे वायु प्रदूषित हो जाती है,
प्रदूषण का स्रोत कोई भी देष हो सकता है पर उसका प्रभाव, सब जगह पड़ता है।
अंटार्कटिका में पाये गये कीटाणुनाशक रसायन, जहाँ कि वो कभी भी प्रयोग में नहीं
लाया गया, इसकी गम्भीरता को दर्शाता है कि वायु से होकर, प्रदूषण एक स्थान से दूसरे
स्थान तक पहुँच सकता है।
प्रमुख वायु प्रदूषण तथा उनके स्रोत
कार्बन मोनो आक्साइड (CO) यह गंधहीन, रंगहीन गैस है। जो कि
पेट्रोल, डीजल तथा कार्बन युक्त ईंधन के पूरी तरह न जलने से उत्पन्न होती है। यह
हमारे प्रतिक्रिया तंत्र को प्रभावित करती है और हमें नींद में ले जाकर भ्रमित करती
है।
कार्बन डाई आक्साइड (CO2) यह प्रमुख ग्रीन हाउस गैस
है जो मानव द्वारा कोयला, तेल तथा अन्य प्राकृतिक गैसों के जलाने से उत्पन्न होती
है।
क्लोरो-फ्लोरो कार्बन (CFC) यह वे गैसें हैं जो कि प्रमुखत:
फ्रिज तथा एयरकंडीशनिंग यंत्रों से निकलती हैं। यह ऊपर वातावरण में पहुँचकर अन्य
गैसों के साथ मिल कर 'ओजोन पर्त' को प्रभावित करती है जो कि सूर्य की हानिकारक
अल्ट्रावायलेट किरणों को रोकने का कार्य करती हैं।
लैड यह पेट्रोल, डीजल, लैड बैटरियां, बाल रंगने के उत्पादों
आदि में पाया जाता है और प्रमुख रूप से बच्चों को प्रभावित करता है। यह रासायनिक
तंत्र को प्रभावित करता है। कैंसर को जन्म दे सकता है तथा अन्य पाचन सम्बन्धित
बीमारियाँ पैदा करता है।
ओजोन यह वायुमंडल की ऊपरी सतह पर पायी जाती है। यह महत्वपूर्ण
गैस, हानिकारक अल्ट्रावायलेट किरणों से पृथ्वी की रक्षा करती हैं। लेकिन पृथ्वी पर
यह एक अत्यन्त हानिकारक प्रदूषक है। वाहन तथा उद्योग, इसके सतह पर उत्पन्न होने के
प्रमुख कारण है। उससे ऑंखों में खुजली जलन पैदा होती है, पानी आता है। यह हमारी
सर्दी और न्यूमोनिया के प्रति प्रतिरोधक शक्ति को कम करती हैं।
नाइट्रोजन आक्साइड (Nox) यह धुऑं पैदा करती है। अम्लीय वर्षा
को जन्म देती है। यह पेट्रोल, डीजल, कोयले को जलाने से उत्पन्न होती है। यह गैस
बच्चों को, सर्दियों में साँस की बीमारियों के प्रति, संवेदनशील बनाती है।
सस्पेन्ड पर्टीकुलेट मैटर (SPM) कभी कभी हवा में धुऑं-धूल
वाष्प के कण लटके रहते हैं। यही धुँध पैदा करते हैं तथा दूर तक देखने की सीमा को कम
कर देते हैं। इन्हीं के महीन कण, साँस लेने से अपने फेंफड़ों में चले जाते हैं,
जिससे श्वसन क्रिया तंत्र प्रभावित हो जाता है।
सल्फर डाई आक्साइड (SO2) यह कोयले के जलने से बनती
है। विशेष रूप से तापीय विद्युत उत्पादन तथा अन्य उद्योगों के कारण पैदा होती रहती
है। यह धुंध, कोहरे, अम्लीय वर्षा को जन्म देती है और तरह-तरह की फेफड़ों की बीमारी
पैदा करती है।
रासायनिक प्रदूषण
विश्व के कई हिस्सों में व्हेल तथा डॉलफिन, जब बहकर समुद्र के किनारे लगी तो
उनमें भारी मात्रा में खतरनाक रासायनिक पदार्थ मिले। इनके शवों का विशेष रूप से
निस्तारण करना पड़ा। रासायनिक प्रदूषण के विभिन्न स्रोत हैं। जैसे -
- घर से निकलने वाली नालियाँ।
- औद्योगिक निस्तारित।
- कूड़ा घरों से होने वाला रिसाव।
- वातावरण से झरने वाले कण।
- घरेलू अपशिष्ट।
- दुर्घटनायें तथा समुद्र में गिरने वाला।
- तेल उत्पाद क्षेत्रों से निकलने वाला।
- खदानों का अपशिष्ट।
- कृषि अपशिष्ट।
हालाँकि, सबसे ज्यादा, चिन्ताजनक रासायनिक प्रदूषण, आग्रही प्रदूषक फैलाते हैं।
यह प्रदूषण समुद्री खाद्य श्रृंखला में प्रवेश कर जाते हैं और अन्तत: समुद्री हिसंक
जानवरों के भोजन का हिस्सा बन जाते हैं। आग्रही प्रदूषकों में से मुख्य है। कीटनाशक
जैसे डीडीटी औद्योगिक रसायन आदि। |